रविवार, 16 सितंबर 2012

22 जून 1945 / वावेल प्रस्ताव पर कुछ विचार / सिंगापुर से प्रसारण




-: 22 जून 1945 :- 
वावेल प्रस्ताव पर कुछ विचार 
सिंगापुर से प्रसारण

भारत में मेरी बहनों और भाइयों! भारत से पहुँचने वाली नवीनतम खबर यह है कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी ने बीती रात शिमला कॉन्फ्रेन्स में भाग लेने के लॉर्ड वावेल के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। जो लोग आज के काँग्रेस की प्रवृत्ति से परिचित हैं, उन्हें इस खबर पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ होगा। एसोशियेटेड प्रेस ऑव इण्डिया के राजनीतिक संवाददाता ने काँग्रेस वर्किंग कमिटी की राय का उल्लेख करते हुए निम्न रपट तैयार की है- वायसराय के प्रस्ताव पर काँग्रेस के नेताओं की राय ने उन्हें तीन गुटों में बाँट दिया है। पहले गुट के नेता श्री गाँधी और वल्लभभाई हैं, जिन्होंने वायसराय के प्रस्ताव में ‘हिन्दू जाति’ शब्द के उपयोग पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है। मध्यमार्गी गुट का नेतृत्व नेहरू और मौलाना आजाद कर रहे हैं, जो हस्तांतरित की जाने वाली शक्ति की मात्रा से संतुष्ट नहीं हैं और इस योजना को अन्तरिम उपाय के रुप में आजमाकर देखने का विचार रखते हैं, बशर्ते कि इसके अन्दर राष्ट्रीय आजादी तथा गरीबों के उत्थान की भारत की माँगों को आगे बढ़ाने की पर्याप्त सम्भावनायें मौजूद रहे। श्री राजगोपालाचारी और श्री भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तीसरा गुट यह महसूस करता है कि शिमला कॉन्फ्रेन्स के नियम एवं शर्तें इतनी विस्तृत एवं लचीली हैं कि काँग्रेस के सभी भय निराधार हैं। उन्होंने सलाह दी है कि बिना कोई छिद्रान्वेषण किये काँग्रेस को इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए, इसे आजमाकर देखना चाहिए और इस प्रकार यह प्रदर्शित करना चाहिए कि वह अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्ध है। 
इतनी दूरी से मैं यह फैसला नहीं कर सकता कि एसोशियेटेड प्रेस के राजनीतिक संवाददाता का विश्लेषण सही है या नहीं, मगर यह अगर सही है, तो मुझे आश्चर्य भी नहीं। सच तो यह है कि यह विश्लेषण मेरे उस आकलन को ही सही ठहराता है, जिसे मैंने कल वर्तमान काँग्रेस वर्किंग कमिटी के राजनीतिक चरित्र के बारे में व्यक्त किया था। ऐसा लगता है कि रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी ने शिमला कॉन्फ्रेन्स की इस आधार पर भर्त्सना की है कि इस कॉन्फ्रेन्स में लेबर प्रतिनिधियों को आमंत्रित नहीं किया गया है। जैसा कि एसोशियेटेड प्रेस ऑव इण्डिया के राजनीतिक संवाददाता के विश्लेषण से पता चलता है, इस मामले पर रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के इस मत का काँग्रेस वर्किंग कमिटी के किसी भी सदस्य ने समर्थन नहीं किया है। इसके पीछे तर्क यही नजर आ रहा है कि शिमला कॉन्फ्रेन्स के आमंत्रण को स्वीकार कर लेने भर से वर्किंग कमिटी इसके प्रति प्रतिबद्ध नहीं हो जायेगी। मगर, इस तर्क को गम्भीरता से नहीं लिया जा सकता; क्योंकि यह प्रस्ताव किस प्रकार का है और इसे स्वीकार करने के क्या नतीजे होंगे- यह स्पष्ट है। जो कोई भी इस कॉन्फ्रेन्स में शामिल होगा, उसे पूर्वी एशिया के भावी युद्ध-अभियानों में दिलो-जान से शामिल होने की नीति को स्वीकार करना होगा; और चूँकि युद्ध में भागीदारी के प्रश्न पर ही काँग्रेसी मंत्रियों ने 1939 में इस्तीफा दिया था, इसलिए काँग्रेस को इस नीति का परित्याग करना ही होगा। इतना ही नहीं, इस कॉन्फ्रेन्स में भाग लेने वालों को एक्ग्जीक्यूटिव काउन्सिल के अन्दर वायसराय और गवर्नर-जेनरल की सांवैधानिक स्थिति को स्वीकार करना होगा और जिम्मेदार मंत्रियों के बजाय मात्र सलाहकार की अपमानजनक भूमिका को स्वीकार करना होगा। लॉर्ड वावेल ने इसमें कोई गोपनीयता नहीं बरती है, बल्कि वास्तव में, उन्होंने साफ-साफ जता दिया है कि वे ही हैं, जो कार्यकारी परिषद के सदस्यों को चुनेंगे। अतः कार्यकारी परिषद के सदस्य उन्हीं के प्रति उत्तरदायी होंगे, न कि विधायिका के प्रति; और कार्यकारी परिषद में सामूहिक उत्तरदायित्व या बहुमत के शासन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। परिणामस्वरुप, शिमला कॉन्फ्रेन्स में भाग लेने वाले सभी लोगों को आजादी की माँग का परित्याग करना होगा। उन्हें केन्द्र में विधायिका के प्रति उत्तरदायी एक राष्ट्रीय सरकार की सामान्य माँग को भी त्यागना होगा और 1935 के अधिनियम के ढाँचे के भीतर काम करने वाली कार्यकारी-परिषद के भारतीयकरण से ही संतुष्ट होना होगा। बहरहाल, इसमें किसी तरह का कोई शक नहीं है कि शिमला कॉन्फ्रेन्स के आमंत्रण को स्वीकार करने का मतलब है काँग्रेस के आधारभूत सिद्धान्तों एवं नीतियों का परित्याग करना और ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव का परित्याग करना, जिसके लिए हमारे बहुत-से भाई एवं साथी अभी तक जेलों में सड़ रहे हैं। इसके अलावे, यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण तथा कष्टदायक है कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी के एक भी सदस्य ने ब्रिटिश सरकार से समझौता करने से पहले राजनीतिक बन्दियों की रिहाई की माँग नहीं उठाई है; जबकि उनमें से बहुतों ने लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव के कुछ विन्दुओं पर बाकायदे बयान जारी कर दिये हैं।
मैंने कल के अपने सम्बोधन में कहा था कि वर्किंग कमिटी एक कार्यकारी निकाय है और सांवैधानिक रुप से इसे इतनी शक्ति प्राप्त नहीं है कि यह लाखों-करोड़ों लोगों की नियति का फैसला करे और देश को उस रास्ते पर ले जाये, जो काँग्रेस के आधारभूत सिद्धान्तों एवं नीतियों के खिलाफ है। चूँकि वर्किंग कमिटी काँग्रेस के अन्दर के सभी धड़ों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, और चूँकि इस मुद्दे पर देश के अन्दर सहमति नहीं है, अतः वर्किंग कमिटी के पास इसका कोई नैतिक- वैधानिक की तो बात ही मत कीजिये- औचित्य नहीं है कि वह ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी तथा समूची काँग्रेस के पीठ पीछे ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार-विमर्श करे। वर्किंग कमिटी के लिए इसका भी कोई औचित्य नहीं है कि वह अपनी जिम्मेवारी पर शिमला कॉन्फ्रेन्स के आमंत्रण को स्वीकार करे; खासकर तब, जबकि यह सारा प्रस्ताव ही काँग्रेस के आधारभूत सिद्धान्त एवं नीति के खिलाफ है।
मैं महात्मा गाँधी तथा वर्किंग कमिटी से विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि इन अन्तिम क्षणों में भी वे थोड़ा ठहरें और उस महती जिम्मेवारी पर विचार करके देखें, जिसे वे लोग इस नाजुक घड़ी में ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी तथा समूची काँग्रेस को नजरअन्दाज करते हुए उठाने जा रहे हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी को ऐसे अनुचित तरीके से व्यवहार करने की जरुरत क्या है! ठीक है, लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार हड़बड़ी में है- यह मैं समझ सकता हूँ। वे तीन उद्देश्य के तहत कार्य कर रहे हैं: पहला, लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार जानती है कि हाल ही में ऐंग्लो-अमेरिकन शक्तियों को मिली सफलता का इस वक्त भारत के लोगों को अहसास है और अब भारतीयों को लगने लगा है कि इस युद्ध में ऐंग्लो-अमेरिकन की जीत तय है। लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार इस मनोवैज्ञानिक स्थिति का फायदा उठाना चाहती है और गरम लोहे पर हथौड़ा चला देना चाहती है। उन्हें डर है कि कुछ महीनों के बाद सारी दुनिया को यह अहसास हो जायेगा कि जर्मनी के पतन के बावजूद जापान को उखाड़ फेंकना इतना आसान काम नहीं है। दूसरा, लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार को किसी भी तरह से इन नेताओं को धोखा देकर सुदूर-पूर्व में ब्रिटेन के भावी साम्राज्यवादी युद्ध में झोंकने के लिए कम-से-कम 5,00,000 भारतीय सैनिकों तथा भारी मात्रा में युद्धक साजो-सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करनी है। तीसरा, लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार को भारतीय नेताओं के साथ किसी-न-किसी समझौते पर 5 जुलाई से पहले पहुँचना ही है, जिस दिन कि ब्रिटेन में आम चुनाव की शुरुआत होने जा रही है। ये तीनों उद्देश्य लॉर्ड वावेल तथा ब्रिटिश सरकार की जल्दीबाजी को जाहिर करने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन इसके पीछे कोई तुक नजर नहीं आता कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी इस फन्दे में क्यों फँसे! इस सम्बन्ध में मैं एक बात को दुहराना चाहूँगा, जिसे पहले मैं कह चुका हूँ कि आखिर क्यों लॉर्ड वावेल 5 जुलाई से पहले भारतीय नेताओं के साथ एक समझौते पर पहुँचने के लिए आकाश-पाताल एक किये हुए हैं।
हालाँकि लेबर पार्टी लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव की शर्तों से सहमत है, फिर भी, इस प्रस्ताव को पार लगाने की जिम्मेवारी कंजर्वेटिव पार्टी पर है, जिसका वर्तमान सरकार में बहुमत है। अतः अगर लॉर्ड वावेल भारतीय नेताओं के साथ एक समझौते पर पहुँचने में सफल हो जाते हैं, तो यह कंजर्वेटिव पार्टी के लिए एक उपलब्धि होगी, जिससे चुनाव में उसके उम्मीदवारों को ज्यादा वोट मिल सकते हैं और इस प्रकार, इस पार्टी को वापस सत्ता में लौटने में मदद मिल सकती है। अगर लॉर्ड वावेल की सफलता के बावजूद कंजर्वेटिव पार्टी बहुमत हासिल करने में विफल रह जाती है और लेबर पार्टी सत्ता में लौटती है, तो कंजर्वेटिव पार्टी भारत के मामले को लेबर कैबिनेट द्वारा फिर से खोले जाने पर कम-से-कम रोक तो लगा ही सकती है। दूसरी तरफ, अगर लॉर्ड वावेल असफल हो जाते हैं- उनकी असफलता का मतलब है कंजर्वेटिव पार्टी की असफलता, तो इससे चुनाव में लेबर पार्टी को मदद मिलेगी। तब लेबर कैबिनेट को भारत के मुद्दे को फिर से हाथ में लेना ही होगा; क्योंकि विदेशी-मामलों के क्षेत्र में कंजर्वेटिव जिसे नहीं कर सके, उसे पूरा करके लेबर कैबिनेट को खुद को साबित करना होगा। और अगर, शिमला कॉन्फ्रेन्स की असफलता के बावजूद कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में लौटती है, तो फिर, भारतीय मुद्दे को फिर से खोलने के लिए तो वह बाध्य होगी। अगर कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में लौटती है और भारत में गतिरोध जारी रहता है, तो भारत का मुद्दा एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना रहेगा और यह मुद्दा अगले कुछ दिनों में होने वाले तीन बड़े सम्मेलनों सहित सभी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में उठाया जायेगा।
अब मैं यह चाहूँगा कि मेरे देशवासी इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि किसी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के मुद्दे को उठने से रोकने के लिए कंजर्वेटिव पार्टी हर सम्भव कोशिश करेगी। कुल-मिलाकर, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अगर हम लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं- मुझे उम्मीद है कि ऐसा ही होगा- तो आम चुनाव के बाद हमारे पास ब्रिटिश सरकार से सौदेबाजी का एक दूसरा मौका होगा, कोई फर्क नहीं पड़ता कि 5 जुलाई को कौन-सी पार्टी बहुमत हासिल करती है। अभी ब्रिटिश सरकार को सुदूर-पूर्व में एक लम्बी तथा तीखी लड़ाई लड़नी है- यह तथ्य एक अतिरिक्त गारण्टी है कि ब्रिटेन भारत क रिझाने की कोशिश करेगा ही करेगा।
आगे बढ़ने से पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि सौदेबाजी का कोई सवाल ही नहीं उठता- अँग्रेजों को बस भारत छोड़कर जाना है। मगर चूँकि घर में बहुत-से ऐसे भारतीय मौजूद हैं, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ एक समझौते पर पहुँचने की सोच रहे हैं, अतः उन्हें यह पता होना चाहिए कि कब और कैसे सौदेबाजी करनी है। इस विन्दु पर, मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि सौदेबाजी के लिए सबसे उपयुक्त समय है- 5 जुलाई के बाद; और हालाँकि उम्मीद कम ही है कि लेबर पार्टी भारत की आजादी को मान्यता देगी, फिर भी, उसी पार्टी के साथ सौदेबाजी करना बेहतर होगा। लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव के मद्दे-नजर ब्रिटिश सरकार के साथ समझौते को दो ही स्थिति में उचित ठहराया जा सकता है- पहली, आजादी मिलने की कोई उम्मीद रह ही न गयी हो; दूसरी, ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता करने का यह आखिरी मौका हो। पहली स्थिति के मामले में, मुझे यह कहना है कि हाल ही में ऐंग्लो-अमेरिकन को मिली सफलताओं के बावजूद, भारत के पास आजादी हासिल करने की पहले के मुकाबले बेहतर सम्भावनायें मौजूद हैं। दूसरी स्थिति के मामले में, मैं फिर से कहना चाहूँगा कि ब्रिटेन में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने, भारत को ब्रिटिश सरकार के साथ सौदेबाजी के लिए एक दूसरा मौका, वह भी बेहतर मौका मिलेगा- 5 जुलाई के बाद।
मेरे विचार से, तीन कारक ऐसे हैं, जिनके तत्काल प्रभाव इस युद्ध के अन्त तक भारत को अपनी आजादी हासिल करने में मदद करेंगे। वे हैं: (1) भारत के अन्दर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रतिरोध; (2) भारत के बाहर ब्रिटिश के साथ सशस्त्र संघर्ष; और (3) अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर कूटनीति। भारत के अन्दर ‘नैतिक’ प्रतिरोध भी काफी रहेगा। भारत को हर हाल में ‘अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा’ बना रहना चाहिए और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की आजादी के लिए लामबन्दी की दिशा में हमारी कूटनीति जारी रहनी चाहिए। भारत को उन देशों की मदद- नैतिक या सामग्री के रुप में- जरुर लेनी चाहिए, जो ब्रिटेन के खिलाफ संघर्षरत हैं, यानि जो ब्रिटेन के शत्रु हैं। जहाँ तक सशस्त्र संघर्ष की बात है, बर्मा में हाल में मिली पराजयों के बावजूद, आजाद हिन्द फौज की मुख्य सेना इस संघर्ष से पीछे हटने वाली नहीं है। हम लड़ाई जारी रखेंगे, और हम आखिरी आदमी तक और आखिरी गोली तक लड़ेंगे। हम पूर्वी एशिया में रहते हुए युद्ध की स्थितियों का बेहतर आकलन कर सकते हैं, बनिस्पत घर में हमारे देशवासियों के, जो कि ब्रिटिश प्रोपागण्डा द्वारा आसानी से दिग्भ्रमित किये जा रहे हैं और ऐंग्लो-अमेरिकन शक्तियों की ताकत के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गयी तस्वीर पर विश्वास करने लगे हैं। अगर घर में हमारे देशवासी हमारी बात पर विश्वास करते हैं, तो उन्हें युद्ध की स्थिति के बारे में हमारे आकलन को स्वीकार करना चाहिए और इस हिसाब से काँग्रेस को अपनी नीति बदल लेनी चाहिए।
जो काँग्रेसी लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को स्वीकार करने की सोच रहे हैं, उन्हें जरा आगे देखना चाहिए और खुद को उस दिन के लिए तैयार करना चाहिए, जब उन्हें पूर्वी एशिया में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी युद्ध में बलि का बकरा बनाने के लिए पाँच लाख भारतीय सैनिकों की व्यवस्था करनी होगी, और उन्हें आजाद हिन्द फौज के अपने ही भाई-बन्धुओं के साथ युद्ध करने के लिए भी खुद को तैयार करना चाहिए, जो ब्रिटिश से लड़ने के लिए सदैव तत्पर हैं- जहाँ कहीं भी वे मिलें। अगर इन काँग्रेसियों को आजाद हिन्द फौज के अपने ही भाई-बहनों के खिलाफ हथियार उठाने में शर्म नहीं आती, तो कम-से-कम उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के स्थायित्व के लिए पाँच लाख भारतीयों की बलि देने से तो इन्कार कर ही देना चाहिए। जिन्हें इस बात पर सन्देह है कि इस युद्ध के अन्त तक भारत आजादी हासिल कर सकता है, उन्हें मैं बताना चाहूँगा कि आजादी के लिए संघर्ष करने का ऐसा मौका दुबारा नहीं मिलने वाला है। धुरी राष्ट्रों के सम्पूर्ण विजय के साथ जैसे ही युद्ध समाप्त होगा- जो कि होना ही है, भारत आजाद होगा और नयी विश्व व्यवस्था में समुचित स्थान ग्रहण करेगा, जिसके तहत एशिया से ऐंग्लो-अमेरिकन दबदबे को हटा दिया जायेगा। और, अगर जापान हार जाता है, तो भारत के पास ब्रिटेन से सौदा करने का एक दूसरा मौका होगा। लेकिन, ब्रिटेन के साम्राज्यवादी युद्ध में हमारे नौजवानों के कत्ले-आम तथा भौतिक संसाधनों की बर्बादी के लिए राजी होना एक राजनीतिक मूर्खता होगी। इसलिए, मेरी आपसे यह अपील है कि वावेल प्रस्ताव को अस्वीकार करें और इस युद्ध के अन्त तक अपना संघर्ष जारी रखें और उसके बाद परिस्थितियों के हिसाब से अपनी अगली कार्रवाई निर्धारित करें। मैं बड़ी उम्मीद के साथ काँग्रेसी नेताओं से अपील करता हूँ कि समझौता करने के लिए वे ज्यादा व्यग्र न हों।   

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